kabir ke dohe in hindi

25  Kabir  ke  dohe  in  hindi

 

नमस्कार www.hinditechtak.com के पाठको को आषाढ़ महीने के पूर्णिमा तीथी को कबीर दास जी के जन्म दिवस के रूप में  मनाया जाता है  कबीर दास जी के जन्म के विषय में किसी को भी सही तरीके से इनके जन्म के बारे में जानकारी नहीं है,पर विद्वानों के सलाह से आषाढ़ महीने के पूर्णिमा को कबीर दास के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

कबीर दास रामानंद के भूलवश दिए गए आशीर्वाद से एक विधवा के गर्भ से पैदा हुए पर पाप समझकर विधवा  ने इन्हे लहरतारा नामक तालाब में फेक आई जहा से निरु और नीमा जुलाहा दम्पति ने उठाकर ले आये और अपने संतान से ज्यादा भरण पोषण किया  कबीर दास जी पढ़े लिखे  नहीं थे,पर उनकी सोच बहुत बड़ी थी और उनकी उसी सोच को हम कबीर दोहे के नाम से पढ़ते है और ज्ञान की गंगा में डुबकी लगाते है कबीर दास के जन्म दिवस के अवसर में कुछ kabir ke dohe का हिंदी अर्थ सहित उल्लेख है

 

(1)

दूजा हैं तो बोलिये, दूजा झगड़ा सोहि
दो अंधों के नाच मे, का पै काको मोहि।

यदि परमात्मा अलग अलग हों तो कुछ कहाॅ जाय। यही तो सभी झगड़ों की जड़ है।
दो अंधों के नाच में कौन अंधा किस अंस अंधे पर मुग्ध या प्रसन्न होगा ।

 

(2)

कबीर जीवन कुछ नहीं, खिन खारा खिन मीठ
कलहि अलहजा मारिया, आज मसाना ठीठ।
कबीर कहते है की यह जीवन कुछ नहीं है।
इस क्षण मे खारा और तुरत जीवन मीठा हो जाता है।
जो योद्धा वीर कल मार रहा था आज वह स्वयं श्मसान में मरा पड़ा है।

(3)

कबीर माया पापिनी, फंद ले बैठी हाट
सब जग तो फंदे परा, गया कबीरा काट।
 
कबीर कहते है की समस्त माया मोह पापिनी है। वे अनेक फंदा जाल लेकर बाजार में बैठी है।
समस्त संसार इस फांस में पड़ा है पर कबीर इसे काट चुके है।

(4)

आशा तजि माया तजी मोह तजी और मन
हरख,शोक निंदा तजइ कहै कबीर संत जान।
 
जो व्यक्ति आशा, माया और मोह को त्याग देता है
तथा जिसने सुख, शोक निन्दा का परित्याग करदिया है
कबीर के कथाअनुसार वही सत्य पर है।

(5)

 
जिनमे जितनी बुद्धि है, तितनो देत बताय
वाको बुरा ना मानिये, और कहां से लाय।
 
जिसे जितना ज्ञान एंव बुद्धि है उतना वह बता देते हैं। तुम्हें उनका बुरा नहीं मानना चाहिये।
उससे अधिक वे कहाॅं से लावें। यहाॅं संतो के ज्ञान प्राप्ति के संबंध कहा गया है।

(6)

हिंदु कहुॅं तो मैं नहीं मुसलमान भी नाहि
पंच तत्व का पूतला गैबी खेले माहि।
 
मैं न तो हिन्दु हूॅ अथवा नहीं मुसलमान। इस पाॅंच तत्व के शरीर में बसने वाली
आत्मा न तो हिन्दुहै और न हीं मुसलमान।

 (7)

सुमिरन की सुधि यों करो जैसे कामी काम
एक पलक बिसरै नहीें निश दिन आठों जाम।
 
ईश्वर के स्मरण पर उसी प्रकार ध्यान दो जैसे कोई लोभी कामी अपनी इच्छाओं का स्मरण करता है।
एक क्षण के लिये भी ईश्वर का विस्मरण मत करो। प्रत्येक दिन आठों पहर ईश्वर पर ध्यान रहना चाहिये।

(8)

 
वाद विवाद मत करो करु नित एक विचार
नाम सुमिर चित लायके, सब करनी मे सार।
 
बहस-विवाद व्यर्थ है। केवल प्रभु का सुमिरन करो।
पूरे चित एंव मनों योग से उनका नाम स्मरण करो। यह सभी कर्मों का सार है।
 

(9)

राम नाम तिहुं लोक मे सकल रहा भरपूर
जो जाने तिही निकट है, अनजाने तिही दूर।
तीनों लोक में राम नाम व्याप्त है। ईश्वर पूर्णाता में सर्वत्र वत्र्तमान हैं।
जो जानता हे-प्रभु उसके निकट हैं परंतु अनजान-अज्ञानी के लिये बहुत दूर हैं।
 

(10)

पुहुप मध्य ज्यों बाश है,ब्यापि रहा जग माहि
संतो महि पाइये, और कहीं कछु नाहि।
जिस प्रकार पुष्प में सुगंध है उसी तरह ईश्वर संपूर्ण जगत में व्याप्त हैं।
यह ज्ञान हमें संतों से हीं प्राप्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त अन्यत्र कुछ भी नहीं है।

(11)

जाके दिल मे हरि बसै, सो जन कलपैै काहि
एक ही लहरि समुद्र की, दुख दारिद बहि जाहि।
कोई व्यक्ति क्यों दुखी होवे या रोये यदि उसके हृदय मे प्रभु का निवास है।
समुद्र के एक हीं लहर से व्यक्ति के सारे दुख एंव दरिद्रता बह जायेगें।

(12)

कबीर पढ़ना दूर करु, अति पढ़ना संसार
पीर ना उपजय जीव की, क्यों पाबै निरधार।
कबीर अधिक पढ़ना छोड़ देने कहते हैं। अधिक पढ़ना सांसारिक लोगों का काम है।
जब तक जीवों के प्रति हृदय में करुणा नहीं उत्पन्न होता,निराधार प्रभु की प्राप्ति नहीं होगी।

(13)

नेह निबाहन कठिन है, सबसे निबहत नाहि
चढ़बो मोमे तुरंग पर, चलबो पाबक माहि।
प्रेम का निर्वाह अत्यंत कठिन है। सबों से इसको निभाना नहीं हो पाता है।
जैसे मोम के घोंड़े पर चढ़कर आग के बीच चलना असंभव होता है।

(14)

प्रेम पियाला सो पिये शीश दक्षिना देय
लोभी शीश ना दे सके, नाम प्रेम का लेय।
प्रेम का प्याला केवल वही पी सकता है जो अपने सिर का वलिदान करने को तत्पर हो।
एक लोभी-लालची अपने सिर का वलिदान कभी नहीं दे सकता भले वह कितना भी प्रेम-प्रेम चिल्लाता हो।

(15)

अंखियाॅ प्रेम कसैया, जीन जाने दुखदै
राम सनेहि कारने, रो-रो रात बिताई।
राम के विरह में आॅंखे लाल हो गयी हैं। प्रभु तुम इसे आॅंख का रोग मत समझना
राम के प्रेम-स्नेह में पूरी रात रो-रो कर बीत रही है।

(17)

काया माहि कबीर है, ज्यों पहुपम मे बास कई जाने कोई जौहरी, कई जाने कोई दास।
 
कबीर के अनुसार इसी शरीर में प्रभु का वास है जैसे फूल में सुगंध का बास है।
इस तथ्य को कोई पारखी या जौहरी जानता है अथवा कोई प्रभु का भक्त या दास।

(18)

नाम हीरा धन पाइये औ हीरा धन मोल चुनि चुनि बांधो गांठरी पल पल देखो खोल।
 
प्रभु के राम रुपी धन को हीरा अनमोल है।
अन्य हीरा धन का मूल्य है। प्रभु का हीरा चुन-चुन कर गठरी बाॅंधों और क्षण-क्षण उसका दर्शन करो।

(19)

कबीर औंधि खोपड़ी, कबहुॅं धापै नाहि
तीन लोक की सम्पदा, का आबै घर माहि।
कबीर के अनुसार लोगों की उल्टी खोपड़ी धन से कभी संतुष्ट नहीं होती तथा
हमेशा सोचती है कि तीनों लोकों की संमति कब उनके घर आ जायेगी।

(20)

जोगी जंगम सेबड़ा ज्ञानी गुणी अपार
शत दर्शन से क्या बने ऐक लोभ की लार।
योगी, जंगम, ज्ञानी ,विद्वान अत्यंत गुणवान भी यदि आदतन लोभी हो तो परमात्मा
का दर्शन प्राप्त नहीं हो सकता है।

(21)

जब घटि मोह समाईया, सबै भया अंधियार
निरमोह ज्ञान बिचारि के, साधू उतरै पार।
जब तक शरीर मे मोह समाया हुआ है-चतुद्रिक अंधेरा छाया है।
मोह से मुक्त ज्ञान के आधार पर संत लोग संसारिकभव सागर से पार चले जाते है।

(22)

कबीर बैरी सबल है, एक जीव रिपु पांच
अपने अपने स्वाद को, बहुत नचाबै नाच।
कबीर कहते हैं कि शत्रु बहुत प्रवल है। जीव एक है पर उसके दुश्मन पाॅंच हंै।
वे अपने स्वाद पसंद के मुताविक हमें बहुत नाच नचाते हैं।

(23)

कबीर मन गाफिल भया, सुमिरन लागे नाहि
घानि सहेगा सासना, जम की दरगाह माहि।
कबीर के अनुसार यह मन अत्यंत मूर्ख है और इसे प्रभु के स्मरण में ध्यान नहीं लगता है।
इसे अंत में यमराज के दरवार में बहुत दंड भोगना पड़ेगा।

(24)

कथा किरतन करन की, जाके निस दिन रीत
कहे कबीर वा दास को निश्चय कीजय प्रीत।
जो व्यक्ति नित्य रुप से प्रभु का कथा कीत्र्तन करता है-कबीर कहते हैं कि
प्रभु के उस दास से निश्चय ही प्रेम करना चाहिये।

(25)

सिर राखे सिर जात है, सिर कटाये सिर होये
जैसे बाती दीप की कटि उजियारा होये।
सिर अंहकार का प्रतीक है। सिर बचाने से सिर चला जाता है-परमात्मा दूर हो जाता हैं।
सिर कटाने से सिर हो जाता है। प्रभु मिल जाते हैं जैसे दीपक की बत्ती का सिर काटने से प्रकाश बढ़ जाता है।
 

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आपका मित्र शशांक कुलदीप द्विवेदी
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