Independence day poem in hindi

    Independence day poem in hindi

Independence day speech

Independence day poem

विजयनी तेरी पताका (महादेवी वर्मा)

विजयनी तेरी पताका!

तू नहीं है वस्त्र तू तो
मातृ भू का ह्रदय ही है,
प्रेममय है नित्य तू
हमको सदा देती अभय है,
कर्म का दिन भी सदा
विश्राम की भी शान्त राका।
विजयनी तेरी पताका!

तू उडे तो रुक नहीं
सकता हमारा विजय रथ है
मुक्ति ही तेरी हमारे
लक्ष्य का आलोक पथ है
आँधियों से मिटा कब
तूने अमिट जो चित्र आँका!
विजयनी तेरी पताका!

छाँह में तेरी मिले शिव
और वह कन्याकुमारी,
निकट आ जाती पुरी के
द्वारिका नगरी हमारी,
पंचनद से मिल रहा है
आज तो बंगाल बाँका!
विजयनी तेरी पताका!

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अनुरागमयी वरदानमयी (महादेवी वर्मा)

अनुरागमयी वरदानमयी
भारत जननी भारत माता!

मस्तक पर शोभित शतदल सा
यह हिमगिरि है, शोभा पाता,
नीलम-मोती की माला सा
गंगा-यमुना जल लहराता,
वात्सल्यमयी तू स्नेहमयी
भारत जननी भारत माता।

धानी दुकूल यह फूलों की-
बूटी से सज्जित फहराता,
पोंछने स्वेद की बूँदे ही
यह मलय पवन फिर-फिर आता।
सौंदर्यमयी श्रृंगारमयी
भारत जननी भारत माता।

सूरज की झारी औ किरणों
की गूँथी लेकर मालायें,
तेरे पग पूजन को आतीं
सागर लहरों की बालाएँ।
तू तपोमयी तू सिद्धमयी
भारत जननी भारत माता!


भारत का झण्डा (मैथिलीशरण गुप्त)

भारत का झण्डा फहरै ।
छोर मुक्ति-पट का क्षोणी पर,
छाया काके छहरै ।।

मुक्त गगन में, मुक्त पवन में,
इसको ऊँचा उड़ने दो ।
पुण्य-भूमि के गत गौरव का,
जुड़ने दो, जी जुड़ने दो ।
मान-मानसर का शतदल यह,
लहर लहर का लहरै ।
भारत का झण्डा फहरै ।।

रक्तपात पर अड़ा नहीं यह,
दया-दण्ड में जड़ा हुआ ।
खड़ा नहीं पशु-बल के ऊपर,
आत्म-शक्ति से बड़ा हुआ ।
इसको छोड़ कहाँ वह सच्ची,
विजय-वीरता ठहरै ।
भारत का झण्डा फहरै ।।

इसके नीचे अखिल जगत का,
होता है अद्भुत आह्वान !
कब है स्वार्थ मूल में इसके ?
है बस, त्याग और बलिदान ।।
ईर्षा, द्वेष, दम्भ; हिंसा का,
हदय हार कर हहरै ।
भारत का झण्डा फहरै ।।

पूज्य पुनीत मातृ-मन्दिर का,
झण्डा क्या झुक सकता है?
क्या मिथ्या भय देख सामने,
सत्याग्रह रुक सकता है?
घहरै दिग-दिगन्त में अपनी
विजय दुन्दभी घहरै ।
भारत का झण्डा फहरै ।।


जय भारत-भूमि-भवानी  (मैथिलीशरण गुप्त)

जय भारत-भूमि-भवानी!
अमरों ने भी तेरी महिमा वारंवार बखानी ।

तेरा चन्द्र-वदन वर विकसित शान्ति-सुधा बरसाता है;
मलयानिल-निश्वास निराला नवजीवन सरसाता है ।
हदय हरा कर देता है यह अंचल तेरा धानी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!

उच्च हदय-हिमगिरि से तेरी गौरव-गंगा बहती है;
और करुण-कालिन्दी हमको प्लावित करती रहती है।
मौन मग्न हो रही देखकर सरस्वती-विधि वाणी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!

तेरे चित्र विचित्र विभूषण हैं शूलों के हारों के;
उन्नत-अम्बर-आतपत्र में रत्न जड़े हैं तारों के ।
केशों से मोती झरते है या मेघों से पानी ?
जय जय भारत-भूमि-भवानी!

वरद-हस्त हरता है तेरे शक्ति-शूल की सब शंका;
रत्नाकर-रसने, चरणों में अब भी पड़ी कनक लंका।
सत्य-सिंह-वाहिनी बनी तू विश्व-पालिनी रानी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!

करके माँ, दिग्विजय जिन्होंने विदित विश्वजित याग किया,
फिर तेरा मृत्पात्र मात्र रख सारे धन का त्याग किया ।
तेरे तनय हुए हैं ऐसे मानी, दानी, ज्ञानी–
जय जय भारत-भूमि-भवानी!

तेरा अतुल अतीत काल है आराधन के योग्य समर्थ;
वर्तमान साधन के हित है और भविष्य सिद्धि के अर्थ ।
भुक्ति मुक्ति की युक्ति, हमें तू रख अपना अभिमानी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!

जय हिन्द,भारत माता की जय

 

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शशांक द्विवेदी

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