Bachpan ko hasne de

Bachpan ko hasne de

 

नमस्कार आप सभी पाठकों का आज मैं ऐसे ही एक garden के सामने से गुजर रहा था तब छोटे छोटे बच्चों को देखकर बचपन पे लिखने का   मन किया   तो बस ये  topic आप सभी के लिए लेकर उपस्थित हूँ Bachapan ko hasne de.

आप सभी ने कभी न कभी किसी न किसी    अपनो के मुँह  से या स्वयं   कभी ये कहा होगा जो भी था बचपन ही अच्छा था,क्यों मैंने सही कहा न, बिल्कुल मैंने भी कहा हैं और  आपने भी कहा होगा। क्यों हम याद करते है कुछ तो खास होगा बचपन में बिल्कुल कुछ नही सब कुछ खास होता हैं,बचपन में जब हम छोटे थे कभी     किसी बात की परवाह नहीं सिर्फ मस्ती खेलकूद और दोस्तो के साथ घूमना न आज की   चिंता न कल का परवाह जो होगा सब अच्छा ही होगा सोचते थे।school से आये फिर क्या बस bag रखे और निकल गए  दोस्तों के    साथ खेलने उधम मचाने घर आये मम्मी को बोले कुछ खाने का दो बोलते ही कुछ न कुछ हाजिर, गर्मियों की छुट्टियां हुई चले गए नानी नाना दादा दादी के घर वहाँ गांव में घूमना बगीचे में खेलना, इमली तोड़ना, बर्फ के गोले खाना, मिट्टी से खेलना,कबड्डी खेलना तरह-तरह के खेल।

वो एक रुपये का सिक्का आज के 1000 रुपये से भी बढ़कर होते थे और हो भी तो क्यो न हो उस 1 रुपये में खुशी थी,जो आज के 1000 रुपये में भी नहीं वो    चौधरी चाचा की दुकान जहाँ 1 रुपये में गोली,चूरन, पिपरमेंट सब कुछ मिल जाया करता था और सबसे बड़ी चीज खुशी तो इतनी की पूछो मत,लेकिन आप आजकल देख रहे होंगे आजकल पूरी दुनिया और हमारे आसपास देख लीजिये वो पहले जैसा बचपन कहा गुम हो गया क्यों हम नहीं जीने दे रहे है अपने बच्चों को जैसे बचपन हमने जियाl कौन हैं ये सब का जिम्मेदार     कहीं न कहीं हम खुद और हमारा over expectation अपने बच्चों से और एक चीज हैं modernization आजकल बड़े बुजुर्ग   और हम स्वयं बस एक ही चीज का use कर रहें हैं,आप समझ गए होंगे मैं क्या चीज बोल रहा हाँ बिल्कुल वो चीज हैं mobile  आजकल हर घर मे 3-4 mobile आसानी से मिल जाएगा बहुत अच्छी चीज हैं smart mobile phone    क्योंकि    हथेली भर चीज  पूरे दुनिया से हमें जोड़ती हैं पर ये तभी उपयोगी चीज हैं जब हम इसका use सही तरीके से करे   अन्यथा ये खुद तो smart हैl पर हमें बेवकूफ बनाकर हमे अपने कब्जे में ले रही हैl

चाहे तो आप खुद अनुभव कर सकते आप सुबह से शाम    तक social media से जुड़े पर खुद social नही हो पा रहे और न हमारे बच्चे बुरा मत मानिये ये कड़वी सच्चाई है और हमारा ही देख हमारे बच्चे भी electronics gadget के गुलाम बनते जा रहेl कोशिश करे आप भी हम भी की social media से जुड़े पर एक  limit तक हरेक चीज का limit cross करना दुख का कारण बनता हैं।

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बच्चे भी मैदान में खेलने के  बजाए   mobile में  game खेलना video game खेलना ज्यादा पसंद कर रहे क्यो क्योंकि वो हमें भी mobile में डूबे हुए देख रहे सुबह से   शाम।तक उनलोगों को छोड़ दीजिए जो वाकई में mobile पे सुबह से शाम अपने job या business के सिलसिले में mobile में लगे हैं उनका काम हैं तो वो तो करेंगे पर वैसे मुश्किल से 10 में से 4 ही लोग हैं।बच्चो का बचपन हँस नहीं पा रहा हैं उसका दूसरा कारण पढ़ाई का over pressure आजकल 3 साल में ही बच्चों को पढ़ाई के लिए भेज दिया जाता हैं फिर उनका course इतना वृहद हो गया कि पूछो मत फिर tution ऊपर से आप बच्चो को उतना ही pressure दो जितना वो झेल सके।

आप सभी parents से आग्रह हैं कि बच्चों को आप वाला बचपन जीने दे आप   समझ रहे हैं न मैं क्या बोल रहा हूँ,हाँ बिल्कुल आप वाली वो चूरन वाली, चाचा चौधरी की    दुकान वाली,   वो नाना  नानी दादा दादी के घर उधम कूद करने वाली, वो पेड़ पर चढ़ने वाली, वो कब्बडी खो खो वाली,वो मिट्टी में खेलने वाला बचपन क्योंकि बचपन की वो मुस्कान की ताकत ही बड़े होने पे मुसीबत और दुख को      झेलने में   साथ देता हैं।  आपने या आपके parents ने कभी बचपन में भविष्य की चिंता में आज बर्बाद किया      था नहीं    बिल्कुल नहीं तो आप अपने बच्चों के साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं हां मैं मानता हूँ कि आज competition ज्यादा है पर कभी आपने   सोचा हैं कोई तीसरी ताकत हैं जो दुनिया चला रही हैं आप या मैं नही कुछ उसके ऊपर भी यकीन करिये   हरेक का मुंह का   निवाला कब कहाँ और कैसे वो ऊपर वाला decide करता हैं।

बचपन पे लिखी दो पंक्ति –

बचपन को हँसने दो दोस्तों,ये हँसी नहीं मोती हैं।

हम तो जी लिये अपना बचपन, अपने बच्चों में अपना बचपन देखने दो।

 

आप सभी parents से आग्रह हैं पसंद आये तो like share करिये अपनो से,इसी बहाने कम से कम अपना बचपन तो याद कर आंखे नम करने दो, धन्यवाद।

आपका मित्र

शशांक कुलदीप द्विवेदी

 

 

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